नीलामी सूचना (०४/०४/२०१८) आगे पढ़ें

मंदिर सर्वेक्षण परियोजना (उत्तर क्षेत्र), भोपाल

मंदिर सर्वेक्षण परियोजना का गठन सन् १९५५ में किया गया था। श्री कृष्ण देव म. स. परि. (उ. क्षे.), भोपाल कार्यालय के प्रथम अधीक्षण पुरातत्वविद् थे।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पूरे भारत में कुछ सर्वेक्षण परियोजनाओं को परिपूर्ण करने हेतू एक महान विचार को जन्म दिया जिसके फलस्वरूप दो मंदिर सर्वेक्षण परियोजनाओं तथा एक भवन सर्वेक्षण परियोजना का गठन किया गया। मंदिर सर्वेक्षण परियोजना का गठन मुख्यतया व्यवस्थित व समग्र रूप से विभिन्न मंदिरों की स्थापत्यीय शैली के अध्ययन हेतु किया गया था।

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मंदिर वीथिका

सर्वेक्षण के दौरान शिव मंदिर पाली, दुर्गा मंदिर टिकिटोरिया, शिव मंदिर तिनसुआ, शिव मंदिर मंडी बमौरा, बैनायका का मंदिर, उल्धान के मंदिर तथा पिठौरिया के मंदिरों का अध्ययन किया गया। कालक्रम के अनुसार इन मंदिरों का तिथिक्रम ६वीं शताब्दी से लेकर १८वीं -१९वीं शताब्दी तक माना जा सकता हैं।

निम्नलिखित तालिका में सरकार द्वारा संरक्षित मंदिरों की एक सूची प्रदान की गई है।

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  • समूह -७ की मंदिर संख्या 'ए'
    २००९-२०१०

    समूह -७ की मंदिर संख्या 'ए'

  • समूह -७ की मंदिर संख्या 'बी'
    २००९-२०१०

    समूह -७ की मंदिर संख्या 'बी'

  • समूह -७ की मंदिर संख्या 'सी'
    २००९-२०१०

    समूह -७ की मंदिर संख्या 'सी'

  • चांदला मंदिर
    २००९-२०१०

    चांदला मंदिर

मंदिर का परिचय : दार्शनिक रूप से हिन्दू मंदिर एक मात्र पूजा का स्थान या संप्रदाय विशेष के धार्मिक आयोजन का स्थान नहीं है

वरन् हम इसे सर्वव्यापी शक्ति का घर भी मान सकते है। अन्य शब्दों में इसे भगवान का घर भी कहा जाता है।

प्राचीन भारतीय साहित्य व शिल्प ग्रंथो में मंदिरों को भगवान के संपूर्ण शरीर की तरह माना गया है, जिसके कारण मंदिर के विभिन्न भागों को पाद, जंघा, शिखर व मस्तक आदि की संज्ञा दी जाती है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों तथा पुरातत्वीय स्थलों व अवशेषों के रख-रखाव के लिये सम्पूर्ण देश को २४ मंडलों में विभाजित किया गया है। संगठन के पास मंडलों, संग्रहालयों, उत्खनन शाखाओं, प्रगौतिहासिक शाखा, पुरालेख शकाओं, विज्ञान शाखा, उद्यान शाखा, भवन सर्वेक्षण परियोजना, मंदिर सर्वेक्षण परियोजनाओं तथा अंतर्जलीय पुरातत्व शाखा के माध्यम से पुरातत्वीय अनुसंधानों के संचालन के लिये बड़ी संख्या में प्रशिक्षित पुरातत्वविदों, संरक्षकों, पुरालेखविदो, वास्तुकारों तथा वैज्ञानिकों का कार्यदल है।

मंदिर सर्वेक्षण परियोजना (उत्तर क्षेत्र), भोपाल

मंदिर सर्वेक्षण परियोजना का गठन सन् १९५५ में किया गया था। श्री कृष्ण देव म. स. परि. (उ. क्षे.), भोपाल कार्यालय के प्रथम अधीक्षण पुरातत्वविद् थे। अपने गठन के समय से ही मंदिर सर्वेक्षण परियोजना कार्यालय उत्तरी भारत में स्थित मंदिरों के अध्ययन व शोधों के प्रति सक्रिय रहा है तथा इसने पुस्तकों, विवरणिकाओं, तथा शोध पत्रों के माध्यम से मंदिरों के सम्बन्ध में बहुत से महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की है। इस महत्वपूर्ण कार्य में श्री कृष्ण देव, एम. डी. खरे, आर. डी. त्रिवेदी, बी. एल. नागार्चे, सुश्री देवला मित्रा, पी. के. त्रिवेदी, आदि विद्वानों ने अपना योगदान दिया है। आज भी विभिन्न शोधार्थी उनके शोध कार्यों, पुस्तकों के माध्यम से मंदिर स्थापत्य के अध्ययन के क्षेत्र में लाभान्वित होते है।

मंदिर का परिचय

साधारतया एक सामान्य मंदिर गर्भगृह व उसके सम्मुख मंडप से संयोजित होता है। कभी-कभी बहुधा अंतराल दोनों भागों को जोड़ता है। निर्माण के प्रारम्भ में मंदिर अपने विन्यास में साधरण व सादे होते थे जिनमें एक वर्गाकार गर्भगृह के ऊपर चपटी छत होती थी। मंदिर के शिखर को उनके उमार (प्रोजेक्शन) दिये गये, विशेष रूप से उत्तरी भारत के मंदिरों को। भारत के मंदिरों को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है :
१. नागर शैली के मंदिर (उत्तर भारतीय शैली)
२. द्रविड़ शैली के मंदिर (दक्षिण भारतीय शैली)
३. बेसर शैली के मंदिर (मिश्रित शैली)

हाल की गतिविधियाँ

२९ मई २०१८

मंदिर सर्वेक्षण परियोजना (उत्तर क्षेत्र), भोपाल में हिंदी बैठक।